हिंदू धर्म में माघ मास को सबसे पवित्र और पुण्यदायी महीनों में सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। इसे "पुण्य का महासागर" कहा जाता है, क्योंकि इस महीने में किया गया प्रत्येक धार्मिक कार्य—चाहे वह स्नान, दान, जप, तप या व्रत हो—अनंत गुना फल प्रदान करता है। पद्म पुराण, महाभारत और अन्य शास्त्रों में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि माघ में पवित्र नदियों, विशेषकर प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में स्नान करने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
शास्त्रों के अनुसार, इस महीने में सभी देवी-देवता पृथ्वी पर अवतरित होकर पवित्र तीर्थों में निवास करते हैं। इसलिए यहां का स्नान सामान्य समय से हजारों गुना अधिक पुण्यकारी हो जाता है। पद्म पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि माघ मास में तीर्थ-स्नान और भगवान विष्णु की पूजा से वह पुण्य प्राप्त होता है, जो कठोर तपस्या से भी दुर्लभ है। प्रयागराज के संगम में एक बार स्नान करने का फल 100 अश्वमेध यज्ञ और 1000 राजसूय यज्ञ के बराबर माना गया है। यहां तक कि ब्रह्म मुहूर्त में घर पर गंगा जल मिलाकर स्नान करने से भी समान पुण्य मिलता है।
इस मास की सबसे बड़ी विशेषता माघ मेला है, जो प्रयागराज (तीर्थराज) के संगम तट पर लगता है। मकर संक्रांति से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक चलने वाला यह मेला दुनिया का सबसे विशाल धार्मिक आयोजन है। लाखों श्रद्धालु यहां कल्पवास करते हैं—एक महीने तक सादा जीवन, नियमित स्नान, मौन, जप और सत्संग में लीन रहकर। मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी और माघी पूर्णिमा जैसे विशेष स्नान पर्वों पर तो यहां की भीड़ अवर्णनीय हो जाती है। शास्त्र कहते हैं कि इस दौरान संगम का जल अमृत-तुल्य हो जाता है, जो न केवल पापों का नाश करता है, बल्कि आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
माघ मास में तिल दान का भी विशेष महत्व है। तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र, स्वर्ण आदि का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु और सूर्य देव की उपासना, अर्घ्यदान और व्रत इस मास की प्रमुख साधनाएं हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भी माघ की महिमा गाई है कि जब सूर्य मकर में प्रवेश करता है, तब सभी तीर्थ नर-देव-दानव संगम में स्नान करने आते हैं।
आज के व्यस्त जीवन में यदि प्रयाग नहीं जा पाएं, तो भी निराश होने की आवश्यकता नहीं। घर पर ही प्रातःकालीन स्नान, गंगा जल का उपयोग, तिल-गुड़ का दान और भगवान का स्मरण करके इस मास का पूरा लाभ लिया जा सकता है। माघ मास हमें सिखाता है कि सच्ची शुद्धि बाहरी नहीं, आंतरिक होती है—जब मन निर्मल हो, तो हर स्नान मोक्ष का द्वार खोल देता है।
आइए, इस पुण्य के महासागर में डुबकी लगाएं और जीवन को अर्थपूर्ण बनाएं। माघ मास की जय हो!
(Akhilesh Kumar is the author)


