भारत का संविधान – विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान
भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा इसे अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को यह पूर्ण रूप से लागू हुआ। मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ और लगभग 1,17,000 शब्द थे, जो आज 105 संशोधनों के बाद लगभग 1,45,000 शब्दों तक पहुँच चुका है। अमेरिका के संविधान में मात्र 7 अनुच्छेद और 4,400 शब्द हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका का संविधान भी केवल 35,000 शब्दों का है। भारत का संविधान इसलिए इतना विस्तृत है क्योंकि यह एक साथ कई भूमिकाएँ निभाता है।
संविधान इतना बड़ा क्यों है?
विविधता का दस्तावेज़
भारत एक बहु-भाषी, बहु-धार्मिक, बहु-जातीय और बहु-सांस्कृतिक देश है। संविधान को इन सबकी आकांक्षाओं को समेटना था। इसलिए इसमें भाषा, धर्म, संस्कृति और क्षेत्रीय अधिकारों की विस्तृत सुरक्षा दी गई है।
शासन की पूरी रूपरेखा
अधिकांश देशों के संविधान केवल मूल ढाँचा देते हैं और बाकी विवरण कानूनों में छोड़ देते हैं। भारत में संघीय ढाँचे के साथ-साथ राज्य सरकारों के अधिकार, स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज और नगरपालिका), चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, लोक सेवा आयोग जैसे हर संस्थान का विस्तार से उल्लेख है।
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्त्व
भाग-3 में 6 मौलिक अधिकार (मूल रूप से 7 थे) और भाग-4 में समाजवादी, गांधीवादी व उदारवादी सिद्धांतों से प्रेरित नीति-निर्देशक तत्त्व दिए गए हैं। ये विश्व के किसी भी संविधान में इतने विस्तार से नहीं हैं।
अनुसूचियाँ और विशेष प्रावधान
12 अनुसूचियाँ (अब) हैं, जिनमें राज्यों की सूचियाँ, भाषाओं की आठवीं अनुसूची, जनजाति क्षेत्रों के लिए पाँचवीं-छठी अनुसूची, भूमि सुधार कानूनों की नौंवी अनुसूची जैसे विषय हैं। ये प्रावधान भारत जैसे जटिल देश के लिए आवश्यक थे।
ऐतिहासिक कारण
संविधान सभा में 299 सदस्य थे, जिनमें जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद जैसे दिग्गज थे। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति ने विश्व के लगभग सभी संविधानों का गहन अध्ययन किया और भारत की ज़रूरतों के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्रावधान चुने।
क्या बड़ा होना कमज़ोरी है?
कई विद्वान कहते हैं कि संविधान बहुत विस्तृत होने से बार-बार संशोधन की ज़रूरत पड़ती है (105 संशोधन अब तक) और न्यायालयों पर बोझ बढ़ता है। लेकिन दूसरी ओर यही विस्तार संविधान को “जीवंत दस्तावेज़” बनाता है। यह समय के साथ बदलते भारत को समायोजित करता रहा है – चाहे आरक्षण का विस्तार हो, जीएसटी हो या नई अनुसूचियाँ।
निष्कर्ष
भारत का संविधान केवल कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक क्रांति का घोषणा-पत्र है। इसकी लंबाई इस बात का प्रमाण है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता से हर संभावित स्थिति का विचार किया। विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान होना कोई गर्व की बात नहीं है, बल्कि भारत की जटिलता, विविधता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सजीव चित्र है। यही कारण है कि 75 वर्ष बाद भी यह संविधान भारत को एक सूत्र में बाँधे हुए है और दुनिया के लिए प्रेरणा बना हुआ है।
(Written By: Akhilesh Kumar)


