हमारा संविधान, हमारी शक्ति भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जो 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

हमारा संविधान, हमारी शक्ति

भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जो 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में बनी यह संविधान पुस्तक नहीं, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों की सामूहिक शक्ति का स्रोत है। “हमारा संविधान, हमारी शक्ति” यह नारा सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि हमारी आजादी की दूसरी लड़ाई का घोषणा-पत्र है।

संविधान हमें क्या देता है? सबसे पहले यह हमें समानता देता है। अनुच्छेद 14 से 18 तक हर नागरिक को कानून के सामने समानता, धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव से मुक्ति का अधिकार मिलता है। आज भी जब दलित, महिला या अल्पसंख्यक के साथ अन्याय होता है, तो वह संविधान की प्रस्तावना में लिखे “न्याय – सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक” की दुहाई देता है। यही संविधान की शक्ति है कि सबसे कमजोर व्यक्ति भी सबसे ताकतवर सरकार को अदालत में घुटनों पर ला सकता है।

दूसरा, संविधान हमें स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 19 हमें अभिव्यक्ति, संगठन, आवागमन, निवास और व्यवसाय की आजादी देता है। सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वाले, सड़क पर प्रदर्शन करने वाले, पत्रकार, कलाकार, छात्र – सब इसी अनुच्छेद की छांव में सांस लेते हैं। जब सरकार UAPA, राजद्रोह जैसे कानूनों से डराने की कोशिश करती है, तब सुप्रीम कोर्ट संविधान के इसी अनुच्छेद को हथियार बना कर नागरिकों की रक्षा करता है।

तीसरा, संविधान हमें लोकतंत्र देता है। एक व्यक्ति – एक वोट – एक मूल्य। चाहे अरबपति हो या रिक्शा चालक, वोट की ताकत एक समान। 2024 के लोकसभा चुनाव में 66% से अधिक मतदान यह सिद्ध करता है कि भारतीय आज भी अपने वोट की ताकत समझता है। पंचायती राज से लेकर संसद तक, संविधान ने सत्ता को दिल्ली के लुटियंस जोन से गाँव की पंचायत तक बाँट दिया है।

लेकिन संविधान कोई जादू की छड़ी नहीं। यह तभी शक्ति बनता है जब हम इसे जीते हैं। केशवानंद भारती केस (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान का “बेसिक स्ट्रचर” कोई भी संसद बदल नहीं सकती। इसका मतलब यह कि धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, संघीय ढांचा, न्यायिक समीक्षा – ये सब अटल हैं। पिछले कुछ वर्षों में जब संसद ने एक के बाद एक संशोधन कर कुछ मूल अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश की, तब नागरिक आंदोलन (CAA-NRC विरोध, किसान आंदोलन) और न्यायपालिका ने खड़े होकर संविधान को बचाया। यह सिद्ध करता है कि संविधान कागज का दस्तावेज नहीं, जीवंत शक्ति है।

आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संविधान को किताब की शोभा बनाकर न रखा जाए। स्कूलों में सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं, जीवन-मूल्य के रूप में पढ़ाया जाए। हर नागरिक को यह याद रखना होगा कि जब भी कोई सत्ता उसके अधिकार छीनने की कोशिश करेगी, तो प्रस्तावना की पहली पंक्ति – “हम भारत के लोग...” – ही सबसे बड़ा हथियार होगी।

संविधान दिवस पर हमें सिर्फ सेमिनार करने या भाषण देने नहीं, संकल्प लेना है कि हम अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करेंगे। क्योंकि जिस दिन हम संविधान को कमजोर होने देंगे, उस दिन हमारी आजादी भी कमजोर हो जाएगी।

हमारा संविधान हमारी शक्ति है – इसे समझें, इसे जिएं, इसे बचाएं।

जय हिंद, जय संविधान!

(Written By: Akhilesh Kumar)


 

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