अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक प्रावधान है जो भारतीय समाज की सबसे पुरानी और घृणित कुरीति – अस्पृश्यता – को पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लेता है। यह अनुच्छेद कहता है:
"अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और इसके किसी भी रूप में आचरण को निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता के आधार पर किसी भी अक्षमता को लागू करना अपराध होगा जिसकी सजा कानून द्वारा दी जाएगी।"
यह संक्षिप्त परंतु अत्यंत शक्तिशाली अनुच्छेद भारतीय संविधान के भाग-3 (मौलिक अधिकार) के अंतर्गत आता है और इसे डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विशेष प्रयासों का परिणाम माना जाता है।
अस्पृश्यता क्या थी?
हजारों वर्षों से भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा के नाम पर कुछ समुदायों को "अछूत" घोषित कर दिया गया था। इन्हें छूना तक पाप माना जाता था। इन लोगों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था, सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं भरने दिया जाता था, स्कूलों में प्रवेश वर्जित था, और ये समाज की मुख्यधारा से पूरी तरह काट दिए गए थे। यह अमानवीय प्रथा न केवल सामाजिक थी, बल्कि धार्मिक स्वीकृति भी प्राप्त थी।
अनुच्छेद 17 का महत्व
कानूनी रूप से अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया – अब कोई व्यक्ति या संस्था किसी को "अछूत" मानकर उसके साथ भेदभाव नहीं कर सकता।
सजा का प्रावधान – 1955 में संसद ने "अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम" पारित किया, जिसे बाद में 1976 में "सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम" और फिर 1989 में "अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम" के रूप में और सशक्त बनाया गया।
सामाजिक क्रांति का आधार – यह अनुच्छेद केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक-नैतिक घोषणा था कि अब भारत में मनुष्य को मनुष्य के रूप में ही देखा जाएगा, उसकी जाति के आधार पर नहीं।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
हालांकि कानून ने अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया, परंतु ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में आज भी यह कुरीति विभिन्न रूपों में जीवित है:
अलग बर्तन में खाना देना
मंदिरों में दलितों का प्रवेश रोकना
शादी-विवाह में भेदभाव
"दो गिलास प्रथा" अभी भी कई गांवों में प्रचलित है
सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई निर्णयों में कहा है कि अस्पृश्यता केवल छूआछूत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सभी अप्रत्यक्ष रूप (जैसे अलग बैठना, अलग लाइन में खड़ा करना) भी अपराध हैं।
निष्कर्ष
अनुच्छेद 17 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं है, यह भारत के पुनर्जन्म का प्रतीक है। यह वह घोषणा है जिसने लाखों-करोड़ों लोगों को पहली बार "मानव" होने का अधिकार दिया। डॉ. अम्बेडकर ने ठीक ही कहा था – "मैं ऐसे संविधान को मान्यता नहीं दूंगा जिसमें मेरे लोगों को गुलाम बनाए रखने की कोई गुंजाइश हो।"
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अनुच्छेद 17 को केवल किताबों में न पढ़ें, बल्कि अपने व्यवहार में उतारें। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को भी सम्मानजनक जीवन नहीं मिलेगा, तब तक गांधी, अम्बेडकर और संविधान निर्माताओं का सपना अधूरा ही रहेगा।
अस्पृश्यता का अंत तभी सार्थक होगा, जब मन से "स्पृश्य-अस्पृश्य" की भावना समाप्त हो जाएगी। यह अनुच्छेद हमें याद दिलाता है कि भारत का असली धर्म मानवता है, और संविधान उसकी सबसे ऊंची अभिव्यक्ति है।
( Written By: Akhilesh Kumar )


