अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 लोक नियोजन (सार्वजनिक रोजगार) के क्षेत्र में सभी नागरिकों को अवसर की समानता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।

अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 लोक नियोजन (सार्वजनिक रोजगार) के क्षेत्र में सभी नागरिकों को अवसर की समानता का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। यह अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का प्रतिषेध) के साथ मिलकर सामाजिक न्याय की नींव रखता है। अनुच्छेद 16 विशेष रूप से राज्य द्वारा संचालित नौकरियों, पदों और सेवाओं में भेदभाव को रोकता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि योग्यता ही चयन का आधार हो।

अनुच्छेद 16 के प्रमुख उपबंध

अवसर की समानता (क्लॉज 1)

"राज्य द्वारा किसी नियोजन या पद पर नियुक्ति के संबंध में सभी नागरिकों को अवसर की समता होगी।"

भेदभाव का प्रतिषेध (क्लॉज 2)

किसी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी भी आधार पर राज्य के अधीन किसी पद या नियोजन से वंचित नहीं किया जाएगा।

निवास संबंधी आरक्षण की अनुमति (क्लॉज 3)

संसद ही किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश में निवास के आधार पर नियुक्ति में प्राथमिकता देने का कानून बना सकती है। (इसका उपयोग मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में हुआ है।)

पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण (क्लॉज 4)

राज्य सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्ति या पदों पर आरक्षण का प्रावधान कर सकता है। यह एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार है।

धर्म या जाति आधारित नियुक्ति की छूट (क्लॉज 5)

किसी धार्मिक संस्थान के पद को किसी विशेष धर्म या संप्रदाय के व्यक्ति के लिए आरक्षित रखा जा सकता है।

पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान (क्लॉज 4A, 4B)

77वें और 85वें संशोधन द्वारा जोड़े गए:

पदोन्नति में आरक्षण (4A)

आरक्षण की 50% सीमा से ऊपर बैकलॉग रिक्तियों को भरने की छूट (4B)

ऐतिहासिक एवं सामाजिक महत्व

स्वतंत्रता के समय भारत में जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव बहुत गहरा था। सरकारी नौकरियों में ऊँची जातियों और विशेष समुदायों का वर्चस्व था। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 16 को इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का सबसे मजबूत हथियार बनाया। यह केवल नौकरी का अधिकार नहीं, बल्कि सदियों से वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाने का साधन है।

न्यायिक व्याख्या के प्रमुख निर्णय

इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने 50% आरक्षण की सीमा तय की और "क्रीमी लेयर" की अवधारणा दी।

एम. नागराज मामले (2006) में पदोन्नति में आरक्षण के लिए तीन शर्तें रखीं – पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता।

जर्नैल सिंह (2018) और जयश्री पाटिल (2021) में क्रीमी लेयर को एससी-एसटी पर लागू न करने का निर्णय।

103वाँ संविधान संशोधन (2019) द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण – यह अनुच्छेद 16 के अंतर्गत ही मान्य हुआ।

वर्तमान चुनौतियाँ

मेरिट बनाम आरक्षण का कृत्रिम विरोध

आरक्षण का राजनीतिक दुरुपयोग

निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग

बैकलॉग रिक्तियों का न भर पाना

क्रीमी लेयर की सही पहचान

निष्कर्ष

अनुच्छेद 16 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं है; यह भारत के सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा इंजन है। यह उन लाखों परिवारों की आशा है जिनके लिए सरकारी नौकरी ही सामाजिक गतिशीलता का एकमात्र रास्ता है। जब तक भारत में जन्म के आधार पर अवसरों का असमान वितरण पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, अनुच्छेद 16 की प्रासंगिकता बनी रहेगी। यह अनुच्छेद हमें याद दिलाता है कि सच्ची समानता तभी संभव है जब वंचितों को आगे बढ़ने के लिए अतिरिक्त सहारा दिया जाए – न कि उन्हें दोष दिया जाए कि वे पीछे रह गए।

( Written By Akhilesh kumar )


 

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