महाशिवरात्रि: परंपरा और भ्रांति के बीच छिपा शास्त्रीय सत्य
महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का सबसे प्रमुख आध्यात्मिक पर्व है, जिसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह "शिव की महान रात्रि" के रूप में जानी जाती है। लोकप्रिय परंपरा में इसे मुख्यतः भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उत्सव के रूप में देखा जाता है, लेकिन शास्त्रों में इसका मूल महत्व इससे कहीं अधिक गहन और आध्यात्मिक है।
सबसे आम भ्रांति यह है कि महाशिवरात्रि केवल शिव-पार्वती विवाह का दिन है। कई लोग इसे "शिव की शादी की वर्षगांठ" मानकर उत्सव मनाते हैं, मंगल गीत गाते हैं और विवाह जैसी रस्में निभाते हैं। हालांकि, शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्रमुख ग्रंथों में स्पष्ट है कि महाशिवरात्रि का मुख्य कारण लिंगोद्भव या अनंत ज्योतिर्लिंग का प्राकट्य है। जब ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब भगवान शिव एक अनंत ज्योति स्तंभ (अग्नि लिंग) के रूप में प्रकट हुए, जिसका आदि-अंत नहीं दिखा। यह घटना सृष्टि के मूल तत्व, परब्रह्म शिव की अनादि-अनंत प्रकृति का प्रतीक है।
एक अन्य लोकप्रिय कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है, जहां हलाहल विष निकला और शिव ने उसे कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की, जिससे वे नीलकंठ कहलाए। कुछ क्षेत्रों में इसे भी महाशिवरात्रि से जोड़ा जाता है, लेकिन शास्त्रीय रूप से यह अलग घटना है। विवाह की कथा लोक परंपरा और कुछ पुराणों की क्षेत्रीय व्याख्याओं में अधिक प्रचलित है, पर मूल शास्त्र इसे महाशिवरात्रि का प्रधान कारण नहीं मानते।
शास्त्रीय सत्य योगिक और तांत्रिक परंपराओं में महाशिवरात्रि आध्यात्मिक साधना की सर्वोत्तम रात्रि है। इस रात पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक ऊर्जा (कुंडलिनी) स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। सद्गुरु जैसे योगियों के अनुसार, यह रात्रि प्रकृति मनुष्य को आध्यात्मिक शिखर तक पहुंचाने में सहायक होती है। इसलिए व्रत, जागरण और ध्यान का विशेष महत्व है। शिव पुराण में कहा गया है कि इस रात की उपासना से हजारों एकादशियों का फल मिलता है, सभी पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
परंपरा में क्या करें? व्रत रखें (फलाहार या निराहार), रात्रि जागरण करें, चार प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक (जल, दूध, शहद आदि से) करें, बेलपत्र, धतूरा, आक चढ़ाएं, "ॐ नमः शिवाय" का जप करें। भांग का प्रसाद लोक परंपरा है, लेकिन शास्त्र इसे अनिवार्य नहीं मानते। मुख्य उद्देश्य बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि, संयम और शिव-तत्व में लीन होना है।
महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि शिव न तो केवल विवाह का प्रतीक हैं, न ही केवल विषपानकर्ता—वे परम चेतना, शून्यता और कल्याण के स्वरूप हैं। परंपरा का आनंद लें, लेकिन भ्रांतियों से ऊपर उठकर शास्त्रीय सत्य को अपनाएं। इस रात जागकर, ध्यान में डूबकर हम उस अनंत ज्योति से जुड़ सकते हैं, जो जीवन के सभी अंधकारों को दूर करती है।
(Akhilesh Kumar is the author)


