असफलता से डर क्यों लगता है? वह सच जो कोई नहीं बताता
असफलता – यह शब्द सुनते ही कई लोगों के मन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ जाती है। हाथ कांपने लगते हैं, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, और दिमाग में नकारात्मक विचारों का तूफान आ जाता है। लेकिन सवाल यह है कि असफलता से डर क्यों लगता है? क्या यह सिर्फ एक प्राकृतिक भावना है, या समाज और हमारी परवरिश ने इसे इतना बड़ा बना दिया है? और सबसे महत्वपूर्ण, वह सच क्या है जो कोई नहीं बताता? आइए, इस विषय पर गहराई से विचार करें।
सबसे पहले, असफलता के डर की जड़ें समझते हैं। मनोविज्ञान के अनुसार, यह डर 'फियर ऑफ फेल्योर' या 'अटिचोफोबिया' कहलाता है। यह डर हमारे दिमाग के उस हिस्से से जुड़ा है जो हमें खतरे से बचाता है। प्राचीन काल में, असफलता का मतलब था शिकार न मिलना या दुश्मन से हारना, जो जीवन-मृत्यु का सवाल था। लेकिन आज के युग में, यह डर ज्यादा मानसिक है। समाज हमें सिखाता है कि सफलता ही सब कुछ है। बचपन से ही हम सुनते हैं – "पढ़ाई में टॉप करो, नहीं तो जीवन बर्बाद।" स्कूल में खराब नंबर, नौकरी में प्रमोशन न मिलना, या बिजनेस में घाटा – ये सब हमें 'फेल' का लेबल दे देते हैं। परिणामस्वरूप, हम असफलता को अपनी पहचान से जोड़ लेते हैं। हम सोचते हैं, "अगर मैं फेल हो गया, तो लोग क्या कहेंगे? मैं खुद को कैसे देखूंगा?"
एक बड़ा कारण है सामाजिक दबाव। सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी सफलताओं की चमकदार तस्वीरें पोस्ट करता है – नई कार, प्रमोशन, या अवॉर्ड। लेकिन असफलताओं की कहानियां छिपी रहती हैं। इससे हमें लगता है कि दूसरे हमेशा सफल होते हैं, और हम अकेले असफल हैं। मनोवैज्ञानिक डेनियल काह्नमैन की 'लॉस एवर्शन थ्योरी' कहती है कि हम लाभ से ज्यादा नुकसान से डरते हैं। असफलता का डर इसलिए बड़ा होता है क्योंकि यह हमें भावनात्मक रूप से चोट पहुंचाती है – आत्मसम्मान गिरता है, रिश्ते प्रभावित होते हैं, और अवसाद का खतरा बढ़ जाता है।
अब वह सच जो कोई नहीं बताता। असफलता वास्तव में डरने की चीज नहीं है; यह सफलता का पहला कदम है। दुनिया के सबसे सफल लोग – जैसे थॉमस एडिसन, जो 10,000 बार असफल हुए थे बल्ब बनाने में, या जे. के. राउलिंग, जिनकी हैरी पॉटर किताब 12 प्रकाशकों ने रिजेक्ट की – बताते हैं कि असफलता ने उन्हें मजबूत बनाया। सच यह है कि असफलता कोई अंत नहीं, बल्कि एक सबक है। कोई नहीं बताता कि 90% स्टार्टअप फेल होते हैं, लेकिन उनमें से कई अगली बार सफल होते हैं। असफलता हमें गलतियां सुधारने का मौका देती है, नई दिशा दिखाती है, और चरित्र निर्माण करती है। लेकिन समाज और मीडिया इसे छिपाते हैं क्योंकि सफलता की कहानियां ज्यादा बिकती हैं। कोई नहीं कहता कि डर असफलता से नहीं, बल्कि 'परफेक्शन' की उम्मीद से आता है। हम सोचते हैं कि सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए, लेकिन जीवन अनिश्चितताओं से भरा है।
इस डर को कैसे दूर करें? सबसे पहले, असफलता को दोस्त बनाएं। इसे 'फीडबैक' के रूप में देखें, न कि 'फेल्योर' के। छोटे-छोटे लक्ष्य रखें और असफल होने पर खुद को दोष न दें। ध्यान रखें, माइंडसेट बदलना जरूरी है। ग्रोथ माइंडसेट अपनाएं, जहां असफलता सीखने का अवसर है। व्यायाम, मेडिटेशन, और दोस्तों से बातचीत मदद कर सकती है। सफल लोगों की असफलताओं की कहानियां पढ़ें – जैसे एलोन मस्क की स्पेसएक्स की शुरुआती असफल लॉन्च। याद रखें, डर सामान्य है, लेकिन इसे हावी न होने दें।
अंत में, असफलता से डर लगना स्वाभाविक है, लेकिन वह सच जो कोई नहीं बताता वह यह है कि बिना असफल हुए कोई सफल नहीं होता। यह जीवन का हिस्सा है, जो हमें बेहतर बनाती है। तो अगली बार जब डर लगे, तो सोचें – यह डर नहीं, विकास का निमंत्रण है। जीवन में जोखिम लें, क्योंकि सुरक्षित रहकर आप कुछ नहीं सीखेंगे। असफलता से डरकर जीना बंद करें, और इसे गले लगाकर आगे बढ़ें। (Akhilesh Kumar is the author)


